ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा के महत्व का अध्ययन

 

श्री गैंद दास मानिकपुरी डा अब्दुल सत्तार डा देवेन्द्र कुमार 

कंलिगा विष्विद्यालय नया रायपुर

*Corresponding Author E-mail: kngajpal@gmail.com

 

ABSTRACT:

शिक्षा जन्म से मृत्युपर्यनत चलने वाली प्रक्रिया है षिक्षा के माध्यम से बालक या व्यक्ति स्वंय को ज्ञान और अनुभव का धनी बनाता है ज्ञान, अनुभव और समायोजन द्वारा वह अपने व्यवहार को परिवर्तित कर समय उपयोगीसिद्ध और कल्याणकारी बनाता है अतःहम कह सकते हैं,कि षिक्षा मानव चेतना का ज्योर्तिमय सांस्कृतिक पक्ष है,जिससे व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होता है

 

 

KEYWORDS: ग्रामीण महिला, स्वसहायता समूह, षिक्षा

 

 

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शिक्षा जन्म से मृत्युपर्यनत चलने वाली प्रक्रिया है षिक्षा के माध्यम से बालक या व्यक्ति स्वंय को ज्ञान और अनुभव का धनी बनाता है ज्ञान अनुभव और समायोजन द्वारा वह अपने व्यवहार को परिवर्तित कर समय उपयोगीसिद्ध और कल्याणकारी बनाता है अतःहम कह सकते हैं,कि षिक्षा मानव चेतना का ज्योर्तिमय सांस्कृतिक पक्ष है, जिससे व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होता है

 

किसी भी देष की प्रगति में वहां की स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है स्त्री ही ऐसे बालकों के निर्माण में सक्षम होती है, जो देष की प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में समर्थ होती है षिक्षित नारी समूह ही परिवार समाज को सुसंस्कृत बनाती है इसी कारण मनु ने कहा हैं, कि -‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तन्त्र देवता‘‘ अर्थात् जहां नारी की पूजा होती है, वहां ईष्वर निवास करते है पूजा का अर्थ रोली अक्षत लेकर चढ़ाने से नहीं है बल्कि इसका अर्थ हैं, कि जहाॅं नारी को गौरव दिया जाता है उसकी षिक्षा की उचित व्यवस्था की जाती है और उसको समाज के निर्माण में पुरूषों के समान की स्वतंत्रता प्रदान की जाती है, वहांॅ देवता निवास करते है भारत के बहुमुखी विकास हेतु स्त्रियों को गौरव प्रदान करना चाहिए और स्त्री षिक्षा को अधिक से अधिक प्रसार करने का भी प्रयास किया जाना चाहिए

 

स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान का निर्माण करते हुए नीति निर्माताओं ने महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष माना और उन्हें विधिक, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समानता प्रदान की गई महिलाओं के सशक्तिकरण में चैथी पंचवर्षीय योजना के बाद से उल्लेखनीय रूप से परिवर्तन आया महिलाओं के विकास के मुद्दे का स्थान महिलाओं सशक्तिकरण ने ले लिया तथा राष्ट्रीय महिला शक्ति सम्पन्नता नीति 2001 घोषित की गई,जिसके लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केन्द्र से लेकर पंचायत स्तर तक प्रयास प्रारंभ किए गए ग्रामीण भारत में इन प्रयासों के दौरान यह महसूस किया गया कि महिलाओं की आय, उनकी शिक्षा, कृषि में उनकी भागीदारी आदिउनकी पारिवारिक सामाजिक प्रस्थिति को मजबूत बनाती है साथ ही विकास के लिए महिलााओं को अधिकार सम्पन्न बनाना एवं उन्हें राष्ट्रीय विकास की मुख्य धारा में लाना बहुत जरूरी है सामान्यतः ग्रामीण महिला एक अवैतनिक कर्मचारी की तरह समझी जाती है जिसके मेहनत और काम को आर्थिक नजरिए से कभी नहीं देखा गया अतः उनके अर्थोपार्जन की क्षमता को बढ़ाने का भी लक्ष्य रखा गया है क्योंकि अगर एक महिला आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली है तो उसके लिए सामाजिक दृष्टि से शक्ति सम्पन्न हो जाना अपेक्षाकृत सरल होता है इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षण और आय पैदा करनेवाली गतिविधियों पर विशेष जोर दिया गया

 

वर्ष 2001 की जनगणना आंकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं की साक्षरता दर 53.67 प्रतिशत है ग्रामीण क्षेत्रों में स्त्री साक्षरता दर मात्र 46.7 प्रतिशत है,जो नगरीय क्षेत्र की स्त्री साक्षरता दर 73.2 प्रतिशत के विरूद्ध काफी असंतोषजनक है कम शिक्षित और अप्रशिक्षित ग्रामीण महिलाओं का भारत में एक विशाल कार्यदल है,जिनको बड़े सुस्थापित व्यापार प्रतिष्ठानों में काम मिलना कठिन होता है कम गतिशीलता, अप्रशिक्षण कार्य की जटिलता के कारण भी ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएँ इन व्यापार प्रतिष्ठानों या उद्योगों में काम नहीं कर पाती हैं अतः इन महिलाओं को छोटे स्तर पर रोजगार उपलब्ध करने वाले व्यवसायों में भागीदारी करने के लिए स्व सहायता समूहों की अवधारणा पर बल दिया गया है हस्तशिल्प, हथकरघे का काम,अचार पापड़ बनाना,राशन दुकान चलाने, कृषि, पशुपालन एवं डेयरी चलाने,खाद्य प्रसंस्करण आदि का संचालन स्व-सहायता समूहों के द्वारा संभव हो सकता है, जहाँ कई महिलाएँ रोजगार प्राप्त कर अपने उद्यम को लाभप्रद तरीके से चला सकती है

 

विकास कार्यक्रमों में ग्रामीण महिलाओं की प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने,उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा उनकी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लागू स्वसहायता समूह की अवधारणा को विकसित हुए अब एक लंबा समय बीत चुका है केन्द्र सरकार की 1998 में प्रारंभ स्वशक्ति योजना, स्वंय सिद्धा (इंदिरा महिला योजना तथा महिला समृद्धि योजना को मिलाकर 12 जुलाई 2001 से प्रारंभ) योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना आदि के अंतर्गत 18.53 लाख स्व सहायता समूह गठित किए जा चुके हैं जिसमें 9.96 लाख समूहों ने ग्रेड -1 और 4.6 लाख समूहों ने ग्रेड - 2 पास कर लिया है वर्ष 2004-05 में इस योजना का बजटीय प्रावधान एक हजार करोड रूपये था तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय ने देश में विभिन्न स्व सहायता समूहों के लिए 150 विशेष परियोजनाएँ मंजूर की है

 छत्तीसगढ़ राज्य में भी इस योजना के अंतर्गत 16000 स्व-सहायता समूह गठित किए गए हैं मार्च 2001 तक इन सहायता समूहों में 1,33,61,327 रूप्ये की धनराषि एकत्रित की गई हैं जिसकी सहायता से महिलाओं के व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन की आवष्यकताओं की पूर्ति हुई हैं विगत 10 वर्षों में पूरे राज्य में लाखों महिलाऐं स्व-सहायता समूह की सदस्य बन चुकी हैं इन ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक सामाजिक सषक्तिकरण में स्व-सहायता समूह का क्या और कितना योगदान हैं तथा ग्रामीण महिलाओं की स्थिति इन समूहों का सदस्य बनने के बाद कितनी परिवर्तित हुई हैं इसका आकलन प्रस्तुत अध्ययन में किया गया है

 

स्वसहायता समूहः

स्वसहायता समूह लगभग एक जैसी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति वाले ऐसे ग्रामीण निर्धनों का एक समूह होता है जो स्वेच्छा से संगठित होते है, नियमित रूप से थोड़ी-थोड़ी राशि बचाकर सामूहिक निधि में जमा करते है और इस राशि का उपयोग अपनी आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आपसी लेन देन द्वारा करते है समूह के सदस्य हफ्ते 15 दिन अथवा महीने में एक बार बैठक करके उसमें विभिन्न विषयों पर चर्चा कर एक दूसरे की कठिनाई का समाधान ढूढ़ते हैं बैठक के दौरान ही बचत राशि जमा की जाती है तथा ऋण का लेनदेन किया जाता है स्वंय सहायता समूह संबंधी सभी नियम सदस्यों की पारस्परिक सहमति से बनाए जाते है

 

स्वसहायता समूह के सदस्य अपनी बैठकों में अपनी निजी समस्याएँ, गांव की सार्वजनिक समस्याएँ आदि सभी तरह के विषयों पर चर्चा कर सकते हैं और सद्भावना समूह के रूप में विकसित हो जाते है इन स्वसहायता समूहों द्वारा केवल निजी आवश्यकताओं हेतु ऋण उपलब्ध हो पाता हैं बल्कि बड़ी संस्थाओं/संसाधनों से ग्रामीण महिलाओं का जुड़ाव होता है सरल दस्तावेज कम कागजी कार्यवाही बिना किसी प्रतिभूति के बैंकों से ऋण उपलब्ध हो जाता है स्वंय नियम बनाने की स्वतंत्रता,आपसी समस्याओं पर चर्चा एवं विचार अभिव्यक्ति के लिए मंच की उपलब्धता आदि अनेक ऐसी सुविधाएँ हैं जिन्होने ग्रामीण महिलाओं को स्वसहायता समूह के रूप में संगठित होने के लिए प्रेरित किया है

 

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह मुख्य उद्देष्यः ग्रामीण स्वसहायता समूह का मुख्य उद्देष्य निम्नलिखित है-

1-   ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के द्वारा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना

2-   ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के द्वारा षिक्षा के माध्यम से षिक्षित करना

3-   ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के द्वारा महिलाओं को जीवन यापन हेतु आर्थिक संसाधन जुटाना

4-   स्वसहायता समूह के द्वारा ग्रामीण महिलाओं में षिक्षा के माध्यम से जागरुकता उत्पन्न करना

5-   स्वसहायता समूह के द्वारा ग्रामीण महिलाओं में षिक्षा के माध्यम से उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना

6-   स्वसहायता समूह के द्वारा ग्रामीण महिलाओं में षिक्षा के माध्यम से नेतृत्व करने की क्षमता का विकास करना

7-   स्वसहायता समूह के द्वारा ग्रामीण महिलाओं में षिक्षा के माध्यम से आत्मविष्वास जागृत करना

 

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा के महत्व:

सशक्तिकरण एक बहुआयामी प्रक्रिया है और सभी क्षेत्रों सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, अपने जीवन का आकार प्रदान करने के लिए पसंद और कार्यवाही की स्वतंत्रता के विस्तार की और संकेत करता है महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए व्यक्तिगत जैसे स्वास्थ्य शिक्षा और रोजगार तथा सामूहिक स्तर पर अपनी समस्याओं के समाधान की कार्यवाही करने के लिए संगठन बनाने और लोगों को जुटाने की योग्यता संबंधी प्रयास करना आवश्यक है ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं को शिक्षा में कम प्राथमिकता मिलती है उन्हें उपयुक्त भोजन और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलती रोजगार क्षेत्र में उनकी उपस्थिति कम है उनकी उत्पादकता कम है आय कम है तथा असंगठित क्षेत्रों में उन्हें पुरूषों की तुलना में कम वेतन मिलता है वे अपने परिवार की समृद्धि में जो योगदान करती है,उनकी उपेक्षा की जाती है

 

भारत शासन के विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत ग्रामीण महिलाओं केे स्तर को ऊपर उठाने हेतु राज्य सरकार ने महिलाओं के उत्थान के लिए ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह गठित करने हेतु प्रत्येक ग्राम पंचायतों में संचालित करने हेतु आदेषित किया है हस्तशिल्प, हथकरघे का काम, अचार पापड़ बनाना, राशन दुकान चलाने, कृषि, पशुपालन एवं डेयरी चलाने, खाद्य प्रसंस्करण आदि का संचालन स्व-सहायता समूहों के द्वारा संभव हो सकता है जहाँ कई महिलाएँ रोजगार प्राप्त कर अपने उद्यम को लाभप्रद तरीके से चला सकती है।विकास कार्यक्रमों में ग्रामीण महिलाओं की प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा उनकी निजी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु लागू स्व सहायता समूह की अवधारणा को विकसित हुए अब एक लंबा समय बीत चुका है

 

साक्षरता के माध्यम से महिलाओं का जीवन स्तर क्रमंषः तेजी के साथ -साथ ऊपर उठना नजर रहा है इससे बैकों में सीधें व्यौर में लेन -देन करने में सक्षम है एवं बेहिचक अपनी बातों कों अधिकारियों कें सामने रखने में सक्षम है गरीबी से जुझ रहे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों में निरक्षरों की संख्या अधिक है परन्तु साक्षरता एवं ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में महिलाएॅ पहले से अधिक जागरूक लगती है गरीबी का स्तर 1980 के पूर्व जैसी नहीं है,प्रत्येक व्यक्ति की आय वार्षिक आय 3400 रू. है,कि महिलाओं को जीवन स्तर में सुधार क्रमषः हो रहा है

 

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है इससे साक्षरता कि आवष्यकता महिलाएॅ महसूस करती है एवं इसी प्ररिप्रेक्ष में महिलाएॅ उत्साहित है।चुंकि उनके गुजर बसर हेतु आय के साधन में धीरे-धीरे महिलाओं का आर्थिक विकास संभव है एक षिक्षित नारी ही गांव राज्य और देष का विकास कर सकती है षिक्षा ही व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाती है इस प्रकार ग्रामीण महिलाओं के जीवन स्तर को ऊचाॅं उठाने,आत्मनिर्भर बनाने के लिए नेतृत्व की क्षमता का विकास करना,आत्विष्वास जागृत करना बचत की भावना उत्पन्न करने में षिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है

 

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह की वर्तमान स्थितिः

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह की वर्तमान स्थिति के अंतर्गत ग्रामीण महिलाएं सरकार की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत कार्यरत् है अपने जीवन स्तर का उच्च बनाने एवं समाज में स्थान पाने के लिए कार्यरत् है रायपुर जिला के अंतर्गत रायपुर तहसील में कुल 600 स्वसहायता समूह का गठन किया गया है इस समूह में गरीबी रेखा के निचे जीवन यापन करने वाली महिलाये,निरक्षर एवं साक्षर महिलायें कार्यरत है इसमें 18 से 40 वर्ष के आयु वाले महिलाये सम्मिलित हैं ये लोग प्रति माह अलग-अलग स्वसहायता समूह के सदस्या 20, 25, 50, रुपये जमा करते है इनका बैंक ग्रामीण बैंक है जिसमें इन लोगों को 4 प्रतिषत ब्याज मिलता है ये महिलाये वर्तमान में आंगन बाड़ी केंद्र, मध्यान्ह भोजन, टेन्ट हाऊस, कपड़ा धोने का निरमा, दोना पत्तल,आचार,पापड़ बनाने का कार्य करती है इस प्रकार ग्रामीण महिलाओं को स्वसहायता समूह द्वारा आत्मनिर्भर बनाने एवं आत्मविष्वास जागृत करने का सहरानीय प्रयास किया जा रहा हैं

 

अध्ययन का उद्देष्यः

अध्ययन का उद्देष्य के अंतर्गत शोधकर्ता द्वारा ली गई समस्या - “ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा के महत्व का अध्ययनहेतु षोधकत्र्ता ने निम्न लिखित उद्देष्यों का निर्माण किया है -

 

01-  ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से आर्थिक स्थिति को मजबूत करना

02-  ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा के महत्व का अध्ययन करना

03-  ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से नेतृत्व करने की क्षमता का विकास करना

 

अध्ययन की परिकल्पना:

प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाएँ निर्मित की है -

 

1 परिकल्पना एच1

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से आर्थिक स्थिति को मजबूत की जा सकती हैं

 

2 परिकल्पना एच2

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा का महत्व है

 

3 परिकल्पना एच

ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से नेतृत्व करने की क्षमता का विकास किया जा सकता है

 

अध्ययन की परिसीमा

इस लघु शोध समस्या के अध्ययन हेतु शोधार्थी ने निम्नलिखित परिसीमाएं निर्मित की है -

1-     अध्ययन हेतु रायपुर जिले का चयन किया गया है

2-     अध्ययन हेतु रायपुर जिले के अंतर्गत रायपुर तहसील का चयन किया गया है

3-     अध्ययन हेतु रायपुर तहसील के पांच गांवों में महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं का चयन किया गया है

4-     अध्ययन हेतु तहसील से प्रत्येक गांव से महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् 20-20 महिलाओं का चयन किया गया है

5-     अध्ययन हेतु कुल 100 महिलाओं का चयन किया गया है

6-     यह अध्ययन केवल ग्रामीण स्वसहायता में कार्यरत् महिलाओं तक सीमित है

7-     प्रस्तुत अध्ययन के अंतर्गत स्वसहायता समूह द्वारा ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना, षिक्षा के महत्व एवं महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से नेतृत्व करने की क्षमता का विकास संबंधी जानकारी संग्रहित की गई है

 

संबंधित शोध साहित्य का अध्ययन

किसी भी अध्ययन के चयन करने पश्चात् यह आवष्यक हो जाता है,कि समस्याओं से संबंधित तथ्यें पर पूर्व में जो संबंधित शोध किये गये है उनके निष्कर्षों का प्रयोग अपने षोध के विषय में समस्या के समाधान के लिये किया जाये इसके लिऐ यह आवष्यक हो जाता है,कि विभिन्न षिक्षा षास्त्रियों मनोविज्ञानिकों ने पूर्व में जो षोध कार्य किये है उनका अध्ययन किये है

 

भारत में किए गए शोध अध्ययन:

कैथरीन (1989) के द्वारा ब्रेक पर किये गये तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया कि लघुवित्तीय नीतियां निर्धन महिलाओं के प्रभावी विकास में सहायक होती है एवं सहभागी महिलाओं के प्रभावी विकास में सहायक होती है एवं सहभागी महिलाओं की आय सृजन में वृद्धि कर स्थानीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाकर सशक्तीकरण करते है,यह महिलाओं को गतिशील बनातें है एवं उनका सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण करते है

 

जुमानी उषा (1991 सेवा के एक अध्ययन से पता चलता है कि यद्यपि महिलाएं रोजगार के लिए तरह-तरह के कार्य बड़ी महेनत से करती है, फिर भी उस काम से होने वाली आय और मुनाफे को अपने रोजगार में वापस लगाने तथा बाजार की स्थिति का सही अंदाजा होने के कारण हिसाब-किताब में कमजोरी की जो अक्षमताएं होती है, उसके कारण उसका इस राशि पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है, तथा उसे महिलाओं को थोड़ी-थोड़ी राशि समय-समय पर उपलब्ध कराते है

 

 

खानकर, एस. आर. (1995 जी.बी.बी.आर..सी. और आर.डी.12 के कुल 1798 परिवारों में से जिसमें 1538 परिवार जिसनें ऋण प्राप्त किया 260 जिसने किसी भी तरह का ऋण प्राप्त नहीं किया के अध्ययन में पाया गया कि पुरूष कर्जदार परिवारों की अपेक्षा महिला ऋण प्राप्तकर्ता परिवारों ने ज्यादा अच्छे जीवन स्तर को प्राप्त किया है

 

महाजन, वी. (1996 ने वल्र्ड बैंक से प्रायोजित 60 गांव के ग्रामीण निर्धन 300 पुरूष 300 महिलाओं 110 ग्रामीण बैंक के अधिकारियों पर किए अध्ययन में पाया कि निर्धनों के लिए वित्तीय सेवाओं में सुधार की आवश्यकता है, साथ ही पाया गया कि वित्तीय सेवाओं में गरीबों के लिए गैर राजनीतिकरण, स्वामित्व प्रशासनिक कसावट की जरूरत है

 

नाबार्ड (1997 के अध्ययन में स्वसहायता समूह के विभिन्न सकारात्मक परिणाम नजर आए है - स्वसहायता समूह के ऋण का आकार बढ़ा है।ऋण का उपयोग उत्पादक आय सृजन के कार्य के लिए किया जाता है।समूह के द्वारा एक संयुक्त संपत्ति का निमार्ण कर समूह की आय में वृद्धि की जाती है समुह में उच्च आय के लिए बेहतर जागरूकता पाई गयी ऋण अदायगी दर लगभग 100 प्रतिशत पायी गयी है सामाजिक आर्थिक सशक्तीकरण लगातार बढ़ता पाया गया

 

पी. के. अवस्थी, दीपक राठी और विमला साहू ने अपने अध्ययन में 70 समूह सदस्यों का चुनाव कर अध्ययन किया इस अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि स्व सहायता समूह के गठन के बाद महिलाओं ने बचत ऋण संबंधी कार्य किया और विकास प्रक्रिया में हिस्सेदारी भी की लेकिन सदस्यों को प्रोत्साहन में कमी, अधोसंरचना में कमी, नियमित माॅनीटरिंग और फाॅलोअप में कमी के कारण उन्होंने हानि उठानी पड़ी इस अध्ययन से यह संकेत मिलता है, कि स्व सहायता समूहों की प्रगति का वार्षिक मूल्यांकन आवष्यक है

 

रीता जलाली ने अपने अध्ययन में विकासषील देषों के महिला संगठनों के प्रमुख समस्याओं का विश्लेषण किया है पिछले दषक में विकासषील विष्व के अनेक भागों में जमीनी स्तर पर महिलाओं का आंदोलन प्रकट हुआ है और उन्होंने अपने अधिकार भी हासिल किए हैं अपने अध्ययन में उन्होंने नूतन भारतीय प्रमाणों का प्रयोग करके विष्लेषण किया है

 

सौन्दर्यजय बोरबोरा और रातुल महंता ने एक प्रायोगिक योजना का 1995 में अध्ययन किया इस अध्ययन का उद्देश्य यह जानना था,कि निर्धनों के आय अर्जन में लघु ऋण की क्या भूमिका है,उनमें बचत की आदत विकसित करने में स्वसहायता समूहों की क्या भूमिका है और महिलाओं के सामाजिक आर्थिक सषक्तिकरण में इस कार्यक्रम का क्या योगदान है?सर्वेक्षण के आंकड़ों के विष्लेषण ने यह दिखलाया है,कि चिन्हित समूहों के 80 प्रतिात सदस्य निर्धन थे समूह के सदस्य अधिकतर महिलाएं थी और लाभकर आर्थिक कार्यक्रमों में व्यस्त थी

 

वी. पुरजेन्द्री और जे. एस. सत्यसांई के अध्ययन में स्व सहायता समूहों के प्रदर्शन का सामाजिक आर्थिक सशक्तिकरण संदर्भ में मूल्यांकन किया गया है स्व सहायता समूहों के गठन से पूर्व तथा गठन के बाद की स्थिति की तुलना इस षोध में की गई अध्ययन से ज्ञात हुआ,कि स्व सहायता समूहों में ग्रामीण गरीबों के आर्थिक सामाजिक सशक्तिकरण में सकारात्मक योगदान देने की क्षमता है लेकिन विभिन्न क्षेत्रों के स्व सहायता समूहों के प्रदर्षन का कोई सुस्पष्ट माॅडल नहीं था दक्षिण क्षेत्र के स्व सहायता समूहों की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक बेहतर थी जबकि दूसरे क्षेत्रों में ऐसा नहीं था साथ ही पुराने समूहों ने सकारात्मक लक्ष्य अधिक होने के कारण नए समूहों के बनिस्बत बेहतर प्रदर्शन किया

 

कमल बट्टा और परमिंदर सिंह ने 2000 में किए गए अध्ययन में यह विश्लेषित किया कि लगभग 83 प्रतिषत बी.पी.एल. समूह बैंक से ऋण लेने के उपयुक्त थे किंतु केवल 5 प्रतिशत को ही यह ऋण मिला था .पी. एल. समूहों को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ा था बैंकों से ऋण मिलने में अत्यधिक कठिनाईयों के कारण स्व सहायता समूह के सदस्यों में संगठन के लाभों के प्रति आशंका उठती है

 

एम. मणिमेखलाई और जी. राजेष्वरी ने 2000 में अपने अध्ययन में बताया कि स्व सहायता समूह की महिलाओं ने अधिकतम लाभ- प्रथम कृषि, द्वितीय व्यापार और तृतीय भोजन प्रबंधन कारोबार से कमाया था अधिकतर समूहों ने अपने उत्पादन बाहर बाजारों में बेचकर सीधे ग्राहकों को बेचा था और लघु व्यवसाय अपनाने के बाद सदस्यों की आमदनी प्रायः दोगुनी हो गई थी

 

एम. अंजुगम और टी. अलगुमनी ने 2000 में एक अध्ययन किया था इस अध्ययन के अनुसार स्व सहायता समूहों ने अपने सदस्यों को ऋण का उचित उपयोग और 100 प्रतिशत ऋण वापसी सिखलाई थी इस अध्ययन से यह स्पष्ट संकेत मिलता है,कि यदि समूह की संरचना सही हो तो उसका सकारात्मक प्रभाव ही होता है

 

विदेशांे में किए गए शोध अध्ययन-

रहमान (1986 के अनुसार-बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के महिला कर्जदारों पुरूष कर्जदारों जिसमें 80 प्रतिशत महिला कर्जदार थी के तुलनात्मक अध्ययन में पाया कि 75 प्रतिशत महिला उधारकर्ता अपने ऋण का उपयोग स्वंय करती है और सामान्यतौर पर उनके परिवार की आय जो कर्जदार महिलाएं नहीं है, से ज्यादा होती है साथ ही उन्होनें अपने अध्ययन में यह भी पाया कि जो महिलाएं सक्रिय कर्जदार ज्यादा है, उनका उपभोग का स्तर जो महिलाएं ऋण का उपयोग नहीं करती से ज्यादा होती है

 

हासमी (1994 ने बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के महिला सदस्य गैर जी.बी. महिलाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने पर पाया गया कि ग्रामीण बैंक की महिलाएं परिवार में ज्यादा प्रभावी आर्थिक भूमिका का निर्वहन करती है परिवार में उनका आर्थिक सहयोग ज्यादा बेहतर होता है ऋण से महिलाओं का प्रभावी सशक्तीकरण होता है

 

अक्रेली (1995 ने बांग्लादेश में तीन वित्तीय संस्थानों ब्रैंक.जी.बी. और सेव बच्चे के 856 कर्जदारों का अध्ययन किया जिसमें 613 महिला उधारकर्ता के अध्ययन में पाया गया कि ऋण से महिलाओं के जीवन में बहुत थोड़ा सुधार आता है, वही महिलाएं ऋण का अधिकतर भाग अपने पति या घर के मुखिया को सौप देती है महिलाओं के कार्यभार में वृद्धि होती है पति के हिंसक व्यवहार में वृद्धि होती है

 

हासमी एवं रीले (1996) ने ग्रामीण बैक की विवाहित महिलाओं के अध्ययन में पाया कि गांव में वे महिलाएं जिन्होनें ऋण लिया है उन महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा सशक्त है, जिन्होनें ऋण प्राप्त नहीं किया है उन्होनें सशक्तीकरण के प्रभावी संकेतक गतिशीलता खरीदी, ब्रिक्री, परिवार में निर्णय की स्वतंत्रता, राजनैतिक जागरूकता, सामाजिक प्रचार -प्रसार, नेतृत्व आदि से महिला सशक्तीकरण को मापा पाया कि परिवार के आय में वृद्धि होती है वे महिलाएं जिन्होनें ऋण नहीं लिया है, वे सशक्तीकरण माप में कम स्कोर करती है

 

इक्व्हेरी गेन्ट जाॅन ने 1992 में किए गए अध्ययन में पाया कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को प्रभावषाली बनाने में जन-साधारण की भागीदारी जरूरी है,लेकिन इस कार्यक्रम में गरीबों की न्यायसंगत भागीदारी नहीं है पश्चिम बंगाल की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम में यह समस्या पाई गई है उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के क्रियान्वयन के समय सत्ताधारी पार्टी अपने संगठन को अधिक लाभ देने के लिए कानून में तोड़ मरोड़ करती है उन्होंने राजनैतिक पार्टियों और गैर सरकारी संगठनों की आपसी प्रतिस्पद्र्धा को अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण बताया है

 

पाॅलकुडी, थाॅमस, सुखपाल सिंह ने 1993 में किए अपने शोध में भारत के छोटे और सीमान्त किसान परिवारों की घटती संख्या की धारणा और खेती किसानी छोड़कर कंगाली की ओर बढ़नेवाली प्रक्रिया को ध्यान में रखकर भारत सरकार की कृषि नीति की जांच पड़ताल की बढ़ी हुई कृषि उत्पादन का संपूर्ण वितरण एक प्रभावशाली शस्त्र है,किंतु उत्पादन के न्यायसंगत वितरण का साधन सुनिष्चित होना आलोचना का विषय है निष्कर्षतः नई कृषि नीति ग्रामीण गरीबों के लिए आशाजनक नहीं है

 

इस्लाम रिजवानुल ने 1990 में एक प्रभावशाली शोध किया जिसमें उन्होंने लिखा है कि 1970 और 1980 के दषक के प्रयास 1960 के दषक की तुलना में अधिक सफल हुए है उन्होंने लिखा है,कि जहां उच्च विकास की दर गरीबी कम करने की पहली शर्त है वहीं यह षर्त अपने आप में संतोेषजनक नहीं है उन्होंने दर्शाया है,कि गरीबी कम करने में व्यापार, विनिमय दर, करारोपण, क्रेडिट, आर्थिक सहायता आदि की समुचित वृद्धि में आर्थिक नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है

 

बासु रूमकी ने अपने अध्ययन में सुझाया है,कि भारत की अपर्याप्त सामाजिक अधोसंरचना को निजीकरण और बाजार की आर्थिक नीति और अधिक कमजोर करेगी तथा गरीबी उन्मूलन हेतु अधिक रोजगारों का सृजन नहीं होगा सरकार की सामाजिक कल्याणकारी हस्तक्षेप की निरंतर आवश्यकता है

 

एमिस फिलिप ने 1995 में किए गए अध्ययन में स्पष्ट किया है, कि श्रम बाजार में रोजगार की उपलब्धता गरीबी कम करने के लिये आवष्यक है,लेकिन श्रम बाजार अनियंत्रित, लिंग भेद सहित, अविष्वसनीय है,साथ ही उन्होंने पर्यावरण के स्वतंत्र स्वभाव संबंधी समस्या को भी उजागर किया है इस अध्ययन के द्वारा रेखांकित किया गया है,कि रोजगार सृजन और पर्यावरण दोनों में वृद्धि होना आवष्यक है

 

शोध - प्रविधि:-

प्रस्तुत शोध समस्या के अध्ययन हेतु शोधकर्ता द्वारा सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है

 

जनसंख्या:-

जनसंख्या के अंतर्गत ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में काम करने वाले कुल 478 परिवारों को षामिल किया गया है

 

न्यादर्श:-

शोध अध्ययन हेतु रायपुर तहसील के 05 गावंों में ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं का चयन यादृच्छिक न्यादर्ष विधि ;त्मदकवउ ैंउचंससपदहद्ध से किया गया है जिसके अन्तर्गत शोधकर्ता ने समस्या के समाधान हेतु 100 ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में कार्यरत् महिलाओं को न्यादर्ष हेतु चयन किया है इनमें से प्राप्त परिणाम समग्र का पूर्णतः प्रतिनिधित्व करेगंे

 

 

 

 

तलिका क्रमांक 1.1 न्यादर्ष के अतंर्गत कार्यरत् ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह की संख्या

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उपकरण:-

प्रदत्तों के साथ उपकरणों का भी विष्वसनीय वैध एवं वस्तुनिष्ठ होना अति आवष्यक है प्रस्तुत षोध प्रबंध में शोधकर्ता द्वारा स्वयं निर्मित उपकरण साक्षात्कार - अनुसूची का प्रयोग किया गया है एवं साक्षात्कार - अनुसूची के द्वारा तथ्यों का संकलन किया गया हैै

 

सांख्यिकीय उपचार:-

सांख्यिकीय अनुसंधान का मूल आधार है अनुसंधान प्रक्रिया में चयनित प्रतिदर्षों के द्वारा प्रदत्तों का संकलन किया गया और सांख्यिकीय विष्लेषण किया गया है प्रस्तुत षोध प्रबंध के अध्ययन में प्रतिषत विधि का प्रयोग समीक्षात्मक अध्ययन के लिए किया गया है ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा के महत्व का अध्ययन से संबंधित स्वनिर्मित साक्षात्कार अनुसूची का निर्माण किया गया है जिसमें अधिकतर (हां/नहीं) वस्तुनिष्ठ प्रष्न हैं इसके लिए संकलित प्रदत्तों को सारणीकृत किया गया प्रदत्तों द्वारा प्राप्त आंकड़ों का योग कर प्रतिषत निकाला गया है

 

निष्कर्ष:-

01. परिकल्पना प्रथम के अनुसार ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से आर्थिक स्थिति से संबंधित विवरण से यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह में काम करने वाली महिलाओं की आर्थिक स्थिति संतोषजन नहीं कही जा सकती हैं 70 प्रतिषत उत्तादाताओं के पास कच्चा मकान है 72 प्रतिषत परिवार के सदस्य अर्थोपार्जन में लगे हुए है 40 प्रतिषत उत्तादाताओं के आय में वृद्वि होना ज्ञात हुआ है 40 प्रतिशत परिवार के लोग तो गरीबी रेखा में आते हैं घर में आवश्यक भौतिक सुविधा की चीजे जैसे-टी.वी., पंखा,मोबाईल एवं अन्य आवष्यक सामग्री उपलब्ध हैं इस प्रकार अनुसार ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है अतः परिकल्पना की आंषिक पुष्टि होती हैं

 

02. परिकल्पना द्वितीय के अनुसार ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा के महत्व से संबंधित उपरोक्त विवरण से यह ज्ञात होता है कि 46 प्रतिषत उत्तरदाताओं निरक्षर है षिक्षा प्राप्त नहीं करने के संबंध में उत्तरदाताओं ने बताया कि 20 प्रतिषत के अनुसार पिताजी ने नहीं पढ़ाया, 15 प्रतिषत के अनुसार खुद नहीं पढ़े,11प्रतिषत उत्तरदाताओं ने आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण नहीं पढ़ पाना बताया है लेकिन ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के माध्यम से 30 प्रतिषत उत्तरदाताओं के अनुसार गांव में साक्षरता अभियान चलाया गया एवं 40 प्रतिषत उत्तरदाताओं के अनुसार साक्षरता केंद्र खोला गया बताया 30 प्रतिषत उत्तरदाताओं के अनुसार 10 प्रतिषत महिलाओं को साक्षर किया गया है षतप्रतिषत उत्तरदाताओं के परिवार के लोग पढ़ाई में रूचि रखते हैं इससे स्पष्ट है कि उत्तरदाओं में षिक्षा के प्रति रूचि है इस प्रकार कह सकते हैं कि ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के विकास में षिक्षा का महत्व है अतः परिकल्पना की पुष्टि होती है

 

03. परिकल्पना तृतीय के अनुसार ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के महिलाओं को साक्षरता के माध्यम से नेतृत्व करने की क्षमता का विकास से संबंधित उपरोक्त विवरण से यह ज्ञात होता है कि 57 प्रतिषत महिलाएं नेतृत्व करने मेें रूचि रखती है 43 प्रतिषत महिलाएं यह स्वीकारती है कि ग्रामीण महिला स्वसहायता समूह के माध्यम से नेतृत्व करने की क्षमता का विकास हुआ है अतः परिकल्पना की पुष्टि होती है

 

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Received on 05.10.2020            Modified on 19.10.2020

Accepted on 11.11.2020            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):256-264.